प्रदेश में गंगा के प्रदूषित होने की शुरुआत तो पश्चिमी हिस्से में हरिद्वार के बाद से ही हो जाती है। बिजनौर जिले में तो वहाँ की फैक्टरियाँ गंगा में विषैला रसायन घोल रही हैं। उसके बाद बिहार और फिर पश्चिम बंगाल का नम्बर आता है। इन राज्यों से रोजाना गंगा में दो करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा गिरता है। गंगा में गन्दे पानी के चिन्हित 26 नाले उत्तराखण्ड में, 68 नाले उत्तर प्रदेश में गिरते हैं जबकि उत्तराखण्ड के दो, उत्तर प्रदेश के 40 बिहार के 23 और पश्चिम बंगाल के 22 नाले गंगा में गिरते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देश की सत्ता पर काबिज होते ही गंगा सफाई के अपने वादे को पूरा करने में केन्द्र सरकार अपने पूरे जोशो-खरोश के साथ जी-जान से जुट तो गई है और नमामि गंगे मिशन की कामयाबी के लिये सरकार के सात मंत्रालय यथा जल संसाधन, शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पेयजल व स्वच्छता, पर्यटन, मानव संसाधन विकास, आयुष व नौवहन मंत्रालय इस चुनौती का मुकाबला करने की दिशा में कोई कोर-कसर भी नहीं रख रहे हैं।
गंगा की शुद्धि के लिये केन्द्र सरकार ने बजट में 20 हजार करोड़ की राशि आवंटित की है। लेकिन इस सबके बावजूद गंगा के भविष्य को लेकर शंका बरकरार है और यह भी कि केन्द्र सरकार के लक्ष्य के अनुरूप गंगा प्रदूषण मुक्त हो पाएगी, इसमें भी सन्देह है। इसकी सबसे बड़ी वजह गन्दे नालों, औद्योगिक इकाइयों द्वारा गंगा में फेंका जा रहा विषैला गन्दा पानी और रसायनयुक्त अवशेष व सहायक नदियों से गंगा में गिरने वाला प्रदूषणयुक्त कचरा व गन्दा पानी है। उस गंगा में जिसे पतितपावनी, पुण्यसलिला और मोक्षदायिनी तक कहा जाता है।
और तो और देश की धर्मभीरू करोड़ों-करोड़ जनता उसे माँ मानती है और जो अकेले 25 फीसदी जल की स्रोत मानी जाती है। यही नहीं देश की तकरीब 26 फीसदी आबादी गंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र में ही बसी हुई है और 13 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर गंगा नदी से ही जुड़ी हुई है। असलियत यह है कि दावे कुछ भी किये जाएँ, आज भी 1,2051 मिलियन लीटर सीवेज बिना शोधन के रोजाना गंगा में गिराया जा रहा है। यही वजह है जिसके चलते गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा दिनोंदिन कम होती जा रही है।
सरकार तक इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है कि औद्योगिक रसायनयुक्त अवशेष, शहरी सीवेज, ठोस विषैला कचरा, रेत व पत्थर की चुनाई और बाँधों से गंगा तिल-तिलकर धीमी मौत मर रही है। नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी के सदस्य, पर्यावरणविद रवि चोपड़ा की मानें तो जगह-जगह बाँध बनने से गंगा का पानी सुरंगों में गायब हो रहा है। गंगा की अविरलता संकट में है। गंगा में सीवर के साथ-साथ उद्योगों का विषैला कचरा जाने से संकट और गहरा गया है।
विडम्बना यह है कि एनजीटी की कड़ाई के बावजूद हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। जबकि एनजीटी ने कहा है कि पर्यावरण सम्बन्धी कानून का उल्लंघन कर नदी को प्रदूषित करने वाली किसी इकाई को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सभी को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुरूप और संज्ञान से चलना होगा। साथ ही मानकों के अनुरूप प्रदूषण से निपटने की व्यवस्था करनी पड़ेगी।
प्रदूषण के मामले में यदि गंगा के उद्गम से जायजा लें तो पाते हैं कि गोमुख से उत्तरकाशी तक छोटे-बड़े तकरीब दस कस्बों में से एक में भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है। यही नहीं गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक गंगा के किनारे सैकड़ों की तादाद में बसे साधु-सन्यासियों के मठों-आश्रमों का मल-मूत्र और गन्दगी भी सीधे तौर पर गंगा में ही तो गिरती है।
कुम्भ, मेला, पर्व आदि के समय तो स्थिति और भयावह हो जाती है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी के मिलने के बाद ही गंगा अपनी यात्रा शुरू करती है। वहाँ पर भागीरथी और अलकनंदा में सीधे तौर पर छह नाले गिरते हैं।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक हरिद्वार में गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऋषिकेश तक गंगा का पानी नहाने लायक जरूर है लेकिन हरिद्वार के बाद यदि कोई इसे पी ले तो उल्टी-दस्त के साथ जानलेवा बीमारियों की गिरफ्त में आने का खतरा है। गंगाजल में प्रदूषण इस हद तक है कि कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना सहित कई जगहों पर यह आचमन लायक तक नहीं है। हरिद्वार से नरौरा तक कुछेक जगहों पर प्रदूषण के चलते गंगाजल काला हो जाता है।
जलीय जीव तो गायब हो चुके हैं। कानपुर की जाजमउ की 425 टेनरियों का 41 एमएलडी रसायनयुक्त कचरा और सीसामउ सहित 14 बड़े नालों की गन्दगी सीधे गंगा में जा रही है। इसके चलते गंगाजल में क्रोमियम लेड और अन्य घातक रसायन मिल रहे हैं।
केन्द्र सरकार के समक्ष गंगा पर रखी गई स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार गंगा नरौरा से बलिया तक सबसे ज्यादा प्रदूषित है। पटना में 172 नालों का गन्दा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। यहाँ 186 एमएलडी सीवेज बिना ट्रीटमेंट के गंगा में जा रहा है। यहाँ केवल 109 एमएलडी सीवेज की रोजाना ट्रीटमेंट की व्यवस्था है लेकिन होता केवल 64 एमएलडी ही है। असलियत में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा को सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश प्रदूषित करता है।
प्रदेश में गंगा के प्रदूषित होने की शुरुआत तो पश्चिमी हिस्से में हरिद्वार के बाद से ही हो जाती है। बिजनौर जिले में तो वहाँ की फैक्टरियाँ गंगा में विषैला रसायन घोल रही हैं। उसके बाद बिहार और फिर पश्चिम बंगाल का नम्बर आता है। इन राज्यों से रोजाना गंगा में दो करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा गिरता है। गंगा में गन्दे पानी के चिन्हित 26 नाले उत्तराखण्ड में, 68 नाले उत्तर प्रदेश में गिरते हैं जबकि उत्तराखण्ड के दो, उत्तर प्रदेश के 40 बिहार के 23 और पश्चिम बंगाल के 22 नाले गंगा में गिरते हैं।
असल में गंगा को गंगा के किनारे बसे गाँवों के लोग अपना कूड़ा ठिकाने लगाने का साधन मानते हैं। विडम्बना यह है कि गंगोत्री से लेकर पश्चिम बंगाल तक कुछेक जगह ही सीवर ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं। कहीं-कहीं तो सात साल में भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लग पाये हैं। कहीं लगे भी हैं तो या तो वे काम नहीं कर रहे हैं या उनकी क्षमता बहुत ही कम है। पटना इसका प्रमाण है। कहीं-कहीं तो नमामि गंगे मिशन की शुरुआत के बाद अब एसटीपी बनने शुरू हुए हैं और कहीं तो 2010 से वे बन ही रहे हैं। कहीं हालत यह है कि एसटीपी के कुएँ ही सूख गए हैं।
हमारी केन्द्रीय जल संसाधन एवं नदी विकास मंत्री साध्वी उमा भारती कहती हैं कि गंगा एक साल में साफ हो जाएगी और अक्टूबर से ही इसका असर दिखाई देने लगेगा। उनके अनुसार बड़े शहरों में कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएँगे जिन्हें चलाने की जिम्मेदारी निजी एजेंसियों को दी जाएगी। ये एजेंसियाँ तीस वर्षों तक इन प्लांटों को चलाएँगी। समझ नहीं आता कि मंत्रीजी किस आधार पर यह दावा कर रहीं हैं। जबकि 30 शहरों में एसटीपी स्थापित करने की खातिर मई-जून में टेंडर निकाले जाएँगे और 50 शहरों में ठेका कम्पनी की नियुक्ति का काम अक्टूबर 2016 से शुरू होगा।
गंगा की सतही सफाई और सभी शहरों में घाटों का काम और सौन्दर्यीकरण का काम अभी शुरू भी नहीं हुआ है, वह आने वाले महीनों में किया जाएगा। वाराणसी अपवाद जरूर है क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है। पल्प व पेपर मिलों के 130 एमएलडी प्रदूषण कम करने, सभी डिस्टलरियों से द्रवीय प्रदूषण पर रोक लगाने और चीनी उद्योगों में 60 फीसदी पानी की खपत कम करने का सवाल इतना आसान नहीं है। अभी तो अकेले कानपुर की टेनरियों पर ही अंकुश नहीं लग सका है।
वे आज भी अपना रसायनयुक्त अवशेष गंगा में डाल रहीं हैं। गंगा के किनारे बसे शहरों के निकायों में सीवेज शोधन की व्यवस्था 2018 तक पूरा होने का अनुमान है। फिर आने वाले पाँच सालों में नदी किनारे बसे 200 गाँवों में नालों का निर्माण, 457 गाँवों में जल शोधन की व्यवस्था का दावा किया जा रहा है।
जहाँ तक गंगा को नालों से मुक्त करने और सफाई का सवाल है, इसमें दो साल से अधिक समय लगेगा। गंगा की सतही सफाई में ही अभी डेढ़-दो साल का समय लग जाएगा। 2018 तक इसके पूरा होने की सम्भावना कम ही है। इसमें अधिक समय लगने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। फिर मंत्री महोदया नमामि गंगे मिशन हेतु आवंटित 20 हजार करोड़ की राशि को अपर्याप्त मानती हैं। उनके अनुसार इस राशि में से 7272 करोड़ की राशि तो पहले से चल रही गंगा की विभिन्न योजनाओं व देनदारियों पर ही खर्च हो जाएँगे। इसलिये नमामि गंगे के लिये केवल 12,728 की राशि ही खर्च होगी। जबकि बीते साल मंत्रालय ने राशि का आवंटन होने के साथ ही 4874 करोड़ रुपए की 76 परियोजनाओं को मंजूरी दी थी।
अब यह आँकड़ा पाँच हजार को भी पार कर गया है। उसके बावजूद काम की गति इतनी धीमी है कि अभी तक उन योजनाओं पर केवल 10 फीसदी ही खर्च हो पाया है। निष्कर्ष यह कि आज भी वही सब हो रहा है जो पिछले तकरीब 30 सालों से हो रहा है। उसमें बदलाव कुछ दिखाई नहीं दे रहा। साथ ही जवाबदेही तय करने के किसी व्यवस्थित तंत्र का पूर्णत: अभाव है। यही नहीं गंगा की सफाई की चुनौती के सामने जनजागरण और प्रदूषण रोकथाम के सारे उपाय नाकाम साबित हो रहे हैं।
इस सम्बन्ध में देश की विभिन्न आईआईटी गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के साथ काम कर रही हैं, फिर भी सफलता कोसों दूर है। अब आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर विनोद तारे को जिम्मेवारी सौंपी गई है कि वे ज्ञान केन्द्र के जरिए नदियों में दिलचस्पी रखने वाले पूरी दुनिया के लोगों से उनके सुझाावों के माध्यम से गंगा की अविरलता और निर्मलता यथावत रखने का प्रयास करें। यह कब होगा, वह भविष्य के गर्भ में है। ऐसे हालात में गंगा मइया की शीघ्र शुद्धि की आशा बेमानी सी प्रतीत होती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देश की सत्ता पर काबिज होते ही गंगा सफाई के अपने वादे को पूरा करने में केन्द्र सरकार अपने पूरे जोशो-खरोश के साथ जी-जान से जुट तो गई है और नमामि गंगे मिशन की कामयाबी के लिये सरकार के सात मंत्रालय यथा जल संसाधन, शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पेयजल व स्वच्छता, पर्यटन, मानव संसाधन विकास, आयुष व नौवहन मंत्रालय इस चुनौती का मुकाबला करने की दिशा में कोई कोर-कसर भी नहीं रख रहे हैं। गंगा की शुद्धि के लिये केन्द्र सरकार ने बजट में 20 हजार करोड़ की राशि आवंटित की है। लेकिन इस सबके बावजूद गंगा के भविष्य को लेकर शंका बरकरार है और यह भी कि केन्द्र सरकार के लक्ष्य के अनुरूप गंगा प्रदूषण मुक्त हो पाएगी, इसमें भी सन्देह है। इसकी सबसे बड़ी वजह गन्दे नालों, औद्योगिक इकाइयों द्वारा गंगा में फेंका जा रहा विषैला गन्दा पानी और रसायनयुक्त अवशेष व सहायक नदियों से गंगा में गिरने वाला प्रदूषणयुक्त कचरा व गन्दा पानी है। उस गंगा में जिसे पतितपावनी, पुण्यसलिला और मोक्षदायिनी तक कहा जाता है।
और तो और देश की धर्मभीरू करोड़ों-करोड़ जनता उसे माँ मानती है और जो अकेले 25 फीसदी जल की स्रोत मानी जाती है। यही नहीं देश की तकरीब 26 फीसदी आबादी गंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र में ही बसी हुई है और 13 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर गंगा नदी से ही जुड़ी हुई है। असलियत यह है कि दावे कुछ भी किये जाएँ, आज भी 1,2051 मिलियन लीटर सीवेज बिना शोधन के रोजाना गंगा में गिराया जा रहा है। यही वजह है जिसके चलते गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा दिनोंदिन कम होती जा रही है।
सरकार तक इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है कि औद्योगिक रसायनयुक्त अवशेष, शहरी सीवेज, ठोस विषैला कचरा, रेत व पत्थर की चुनाई और बाँधों से गंगा तिल-तिलकर धीमी मौत मर रही है। नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी के सदस्य, पर्यावरणविद रवि चोपड़ा की मानें तो जगह-जगह बाँध बनने से गंगा का पानी सुरंगों में गायब हो रहा है। गंगा की अविरलता संकट में है। गंगा में सीवर के साथ-साथ उद्योगों का विषैला कचरा जाने से संकट और गहरा गया है।
विडम्बना यह है कि एनजीटी की कड़ाई के बावजूद हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। जबकि एनजीटी ने कहा है कि पर्यावरण सम्बन्धी कानून का उल्लंघन कर नदी को प्रदूषित करने वाली किसी इकाई को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सभी को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुरूप और संज्ञान से चलना होगा। साथ ही मानकों के अनुरूप प्रदूषण से निपटने की व्यवस्था करनी पड़ेगी।
प्रदूषण के मामले में यदि गंगा के उद्गम से जायजा लें तो पाते हैं कि गोमुख से उत्तरकाशी तक छोटे-बड़े तकरीब दस कस्बों में से एक में भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है। यही नहीं गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक गंगा के किनारे सैकड़ों की तादाद में बसे साधु-सन्यासियों के मठों-आश्रमों का मल-मूत्र और गन्दगी भी सीधे तौर पर गंगा में ही तो गिरती है।
कुम्भ, मेला, पर्व आदि के समय तो स्थिति और भयावह हो जाती है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी के मिलने के बाद ही गंगा अपनी यात्रा शुरू करती है। वहाँ पर भागीरथी और अलकनंदा में सीधे तौर पर छह नाले गिरते हैं।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक हरिद्वार में गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऋषिकेश तक गंगा का पानी नहाने लायक जरूर है लेकिन हरिद्वार के बाद यदि कोई इसे पी ले तो उल्टी-दस्त के साथ जानलेवा बीमारियों की गिरफ्त में आने का खतरा है। गंगाजल में प्रदूषण इस हद तक है कि कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना सहित कई जगहों पर यह आचमन लायक तक नहीं है। हरिद्वार से नरौरा तक कुछेक जगहों पर प्रदूषण के चलते गंगाजल काला हो जाता है।
जलीय जीव तो गायब हो चुके हैं। कानपुर की जाजमउ की 425 टेनरियों का 41 एमएलडी रसायनयुक्त कचरा और सीसामउ सहित 14 बड़े नालों की गन्दगी सीधे गंगा में जा रही है। इसके चलते गंगाजल में क्रोमियम लेड और अन्य घातक रसायन मिल रहे हैं।
केन्द्र सरकार के समक्ष गंगा पर रखी गई स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार गंगा नरौरा से बलिया तक सबसे ज्यादा प्रदूषित है। पटना में 172 नालों का गन्दा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। यहाँ 186 एमएलडी सीवेज बिना ट्रीटमेंट के गंगा में जा रहा है। यहाँ केवल 109 एमएलडी सीवेज की रोजाना ट्रीटमेंट की व्यवस्था है लेकिन होता केवल 64 एमएलडी ही है। असलियत में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा को सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश प्रदूषित करता है।
प्रदेश में गंगा के प्रदूषित होने की शुरुआत तो पश्चिमी हिस्से में हरिद्वार के बाद से ही हो जाती है। बिजनौर जिले में तो वहाँ की फैक्टरियाँ गंगा में विषैला रसायन घोल रही हैं। उसके बाद बिहार और फिर पश्चिम बंगाल का नम्बर आता है। इन राज्यों से रोजाना गंगा में दो करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा गिरता है। गंगा में गन्दे पानी के चिन्हित 26 नाले उत्तराखण्ड में, 68 नाले उत्तर प्रदेश में गिरते हैं जबकि उत्तराखण्ड के दो, उत्तर प्रदेश के 40 बिहार के 23 और पश्चिम बंगाल के 22 नाले गंगा में गिरते हैं।
असल में गंगा को गंगा के किनारे बसे गाँवों के लोग अपना कूड़ा ठिकाने लगाने का साधन मानते हैं। विडम्बना यह है कि गंगोत्री से लेकर पश्चिम बंगाल तक कुछेक जगह ही सीवर ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं। कहीं-कहीं तो सात साल में भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लग पाये हैं। कहीं लगे भी हैं तो या तो वे काम नहीं कर रहे हैं या उनकी क्षमता बहुत ही कम है। पटना इसका प्रमाण है। कहीं-कहीं तो नमामि गंगे मिशन की शुरुआत के बाद अब एसटीपी बनने शुरू हुए हैं और कहीं तो 2010 से वे बन ही रहे हैं। कहीं हालत यह है कि एसटीपी के कुएँ ही सूख गए हैं।
हमारी केन्द्रीय जल संसाधन एवं नदी विकास मंत्री साध्वी उमा भारती कहती हैं कि गंगा एक साल में साफ हो जाएगी और अक्टूबर से ही इसका असर दिखाई देने लगेगा। उनके अनुसार बड़े शहरों में कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएँगे जिन्हें चलाने की जिम्मेदारी निजी एजेंसियों को दी जाएगी। ये एजेंसियाँ तीस वर्षों तक इन प्लांटों को चलाएँगी। समझ नहीं आता कि मंत्रीजी किस आधार पर यह दावा कर रहीं हैं। जबकि 30 शहरों में एसटीपी स्थापित करने की खातिर मई-जून में टेंडर निकाले जाएँगे और 50 शहरों में ठेका कम्पनी की नियुक्ति का काम अक्टूबर 2016 से शुरू होगा।
गंगा की सतही सफाई और सभी शहरों में घाटों का काम और सौन्दर्यीकरण का काम अभी शुरू भी नहीं हुआ है, वह आने वाले महीनों में किया जाएगा। वाराणसी अपवाद जरूर है क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है। पल्प व पेपर मिलों के 130 एमएलडी प्रदूषण कम करने, सभी डिस्टलरियों से द्रवीय प्रदूषण पर रोक लगाने और चीनी उद्योगों में 60 फीसदी पानी की खपत कम करने का सवाल इतना आसान नहीं है। अभी तो अकेले कानपुर की टेनरियों पर ही अंकुश नहीं लग सका है।
वे आज भी अपना रसायनयुक्त अवशेष गंगा में डाल रहीं हैं। गंगा के किनारे बसे शहरों के निकायों में सीवेज शोधन की व्यवस्था 2018 तक पूरा होने का अनुमान है। फिर आने वाले पाँच सालों में नदी किनारे बसे 200 गाँवों में नालों का निर्माण, 457 गाँवों में जल शोधन की व्यवस्था का दावा किया जा रहा है।
जहाँ तक गंगा को नालों से मुक्त करने और सफाई का सवाल है, इसमें दो साल से अधिक समय लगेगा। गंगा की सतही सफाई में ही अभी डेढ़-दो साल का समय लग जाएगा। 2018 तक इसके पूरा होने की सम्भावना कम ही है। इसमें अधिक समय लगने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। फिर मंत्री महोदया नमामि गंगे मिशन हेतु आवंटित 20 हजार करोड़ की राशि को अपर्याप्त मानती हैं। उनके अनुसार इस राशि में से 7272 करोड़ की राशि तो पहले से चल रही गंगा की विभिन्न योजनाओं व देनदारियों पर ही खर्च हो जाएँगे। इसलिये नमामि गंगे के लिये केवल 12,728 की राशि ही खर्च होगी। जबकि बीते साल मंत्रालय ने राशि का आवंटन होने के साथ ही 4874 करोड़ रुपए की 76 परियोजनाओं को मंजूरी दी थी।
अब यह आँकड़ा पाँच हजार को भी पार कर गया है। उसके बावजूद काम की गति इतनी धीमी है कि अभी तक उन योजनाओं पर केवल 10 फीसदी ही खर्च हो पाया है। निष्कर्ष यह कि आज भी वही सब हो रहा है जो पिछले तकरीब 30 सालों से हो रहा है। उसमें बदलाव कुछ दिखाई नहीं दे रहा। साथ ही जवाबदेही तय करने के किसी व्यवस्थित तंत्र का पूर्णत: अभाव है। यही नहीं गंगा की सफाई की चुनौती के सामने जनजागरण और प्रदूषण रोकथाम के सारे उपाय नाकाम साबित हो रहे हैं।
इस सम्बन्ध में देश की विभिन्न आईआईटी गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के साथ काम कर रही हैं, फिर भी सफलता कोसों दूर है। अब आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर विनोद तारे को जिम्मेवारी सौंपी गई है कि वे ज्ञान केन्द्र के जरिए नदियों में दिलचस्पी रखने वाले पूरी दुनिया के लोगों से उनके सुझाावों के माध्यम से गंगा की अविरलता और निर्मलता यथावत रखने का प्रयास करें। यह कब होगा, वह भविष्य के गर्भ में है। ऐसे हालात में गंगा मइया की शीघ्र शुद्धि की आशा बेमानी सी प्रतीत होती है।


